नागपुर स्नातक चुनाव में भाजपा को दोहरा झटका! सोले की बगावत, व्यास का इस्तीफा

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नागपुर | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट

नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव अब केवल उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं रहा, बल्कि भाजपा के भीतर उभरे असंतोष और नेतृत्व के फैसलों को लेकर खुले टकराव का केंद्र बन गया है। पार्टी ने पूर्व विधायक सुधाकर कोहले को अधिकृत उम्मीदवार बनाया, लेकिन प्रा. अनिल सोले ने निर्दलीय मैदान में डटे रहकर पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती खड़ी कर दी। अब भाजपा के पुराने और प्रभावशाली नेता रहे पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर सोले के समर्थन में उतर आए है।

एक तरफ पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार, दूसरी तरफ बागी सोले और उनके समर्थन में खड़े व्यास!

इस घटनाक्रम ने नागपुर भाजपा की अंदरूनी राजनीति को सुर्खियों में ला दिया है। टिकट वितरण से शुरू हुआ विवाद अब इस्तीफे और खुले समर्थन तक पहुंच चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर पार्टी के पुराने नेताओं की नाराजगी को नेतृत्व समय रहते क्यों नहीं सुलझा पाया? आखिर दिग्गज नेता व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने इस अंदरूनी फुट को रोकने का कार्य क्यों नही किया?

टिकट की लड़ाई से खुला असंतोष का मोर्चा!

प्रा. अनिल सोले भाजपा के उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जिन्होंने लंबे समय तक संगठन में काम किया। वे नागपुर महानगरपालिका के महापौर और कई बार नगरसेवक रह चुके हैं। वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था और वे विधान परिषद पहुंचे थे।

लेकिन वर्ष 2020 में पार्टी ने उनका टिकट काटकर संदीप जोशी को मैदान में उतारा। उस चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज की और यह सीट भाजपा के हाथ से निकल गई। इसके बावजूद सोले पार्टी में बने रहे और अपनी राजनीतिक गतिविधियां जारी रखीं।

इस बार भी उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उनके अनुभव और पुराने योगदान को ध्यान में रखेगी। लेकिन भाजपा ने पूर्व विधायक सुधाकर कोहले को उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसके बाद सोले ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। नामांकन वापसी की अंतिम तारीख तक उनका पीछे नहीं हटना इस विवाद का निर्णायक मोड़ बन गया।

व्यास का इस्तीफा, भाजपा के लिए नई चुनौती!

इस राजनीतिक घटनाक्रम में गिरीश व्यास का फैसला सबसे ज्यादा चर्चा में है। भाजपा के पुराने और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले व्यास ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर सोले को समर्थन दिया है।

व्यास का यह कदम केवल एक निर्दलीय उम्मीदवार के समर्थन तक सीमित नहीं है। इससे उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के भीतर मौजूद असहमति सार्वजनिक हो गई है। जिस चुनाव में भाजपा अपने अधिकृत प्रत्याशी के समर्थन में संगठन को एकजुट करना चाहती है, उसी चुनाव में पार्टी के पुराने नेता का इस्तीफा राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।

सोले ने बड़कस चौक स्थित गिरीश व्यास के निवास पर अपना मध्यवर्ती चुनाव कार्यालय भी शुरू किया है। इससे दोनों नेताओं के बीच समर्थन और समन्वय का संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया है।

कोहले के सामने दोहरी चुनौती!

भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले के सामने अब चुनावी मुकाबले के साथ-साथ पार्टी के भीतर पैदा हुए असंतोष को लेकर भी सवाल खड़े हैं। एक ओर पार्टी संगठन की ताकत और अधिकृत उम्मीदवार का आधार है, तो दूसरी ओर सोले का व्यक्तिगत राजनीतिक संपर्क और व्यास का समर्थन है।

हालांकि, इस घटनाक्रम का अंतिम चुनावी असर अभी स्पष्ट नहीं है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे किसी उम्मीदवार को निश्चित लाभ या नुकसान होगा। लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के भीतर उभरा यह विवाद चुनावी चर्चा के केंद्र में आ गया है।

2020 की हार की पृष्ठभूमि, फिर प्रतिष्ठा की लड़ाई

वर्ष 2020 में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने यह सीट जीतकर भाजपा को झटका दिया था। अब भाजपा इस निर्वाचन क्षेत्र में वापसी की कोशिश कर रही है। लेकिन उम्मीदवार चयन के बाद पैदा हुए विवाद ने पार्टी के लिए चुनावी रणनीति के साथ संगठनात्मक एकजुटता का प्रश्न भी खड़ा कर दिया है।

इस बार मुकाबले में सुधाकर कोहले, निर्दलीय प्रा. अनिल सोले और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी जैसे प्रमुख नाम हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर का यह टकराव किस हद तक मतदाताओं के रुख को प्रभावित करेगा, इस पर सभी की निगाहें रहेंगी।

अब मतपेटी बताएगी नाराजगी की ताकत!

नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सोले की बगावत और गिरीश व्यास के इस्तीफे ने चुनाव को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। भाजपा नेतृत्व के लिए अब चुनौती केवल अपने अधिकृत उम्मीदवार के प्रचार तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के पुराने नेताओं के बीच पैदा हुई नाराजगी के राजनीतिक प्रभाव को समझने की भी है।

अब असली तस्वीर चुनाव परिणाम के बाद ही सामने आएगी कि यह बगावत केवल संगठनात्मक विवाद थी या इसका असर स्नातक मतदाताओं के फैसले में भी दिखाई दिया।

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